समाजवादी पार्टी में साइकिल पर ‘दंगल’

उत्तर प्रदेश में साइकिल की लड़ाई का दंगल फ़िल्मी दंगल से भी जोरदार चल रहा है|पांच राज्यों यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो चुका है, चुनाव की तारीखों के ऐलानके साथ ही सियासी पार्टियां अब पूरी तरह से ऐक्शन में आ चुकी है । लेकिन इस बार के यूपी चुनाव बेहद ही खास बन चुके है, वो इसलिए क्योंकि यूपी की समाजवादी पार्टी दो टुकड़ों में बंट चुकी है।

सीएम अखिलेश यादव और SP के मुखिया मुलायम सिंह यादव में चुनाव चिह्न ‘साइकिल’ के दावे को लेकर घमासान मचा हुआ है। साथ ही इस घमासान पर दूसरी पार्टियों की भी पैनी नजर है । कांग्रेस, बीजेपी और बसपा भी युपी विधानसभा चुनाव में जीत के लिए आगे आ रही है।वहीं ताल ठोकर दावों पर खरा उतरने वाली पार्टियों के दावों की असलियत भी चुनाव के बाद सामने आ जाएगी। कौन कितने पानी में होगा ?,  किसकी किस्मत चमकेगी? और किसकी चमक को फीका करेंगे मतदाता, ये तो चुनाव के बाद भी साफ हो जाएगा।

समाजवादी पार्टी में साइकिल पर 'दंगल'

पिता-पुत्र की लड़ाई हुई सार्वजानिक

पिता-पुत्र के बीच शुरू हुई वर्चस्व की जंग घर से निकल अब सार्वजनिक मंच से होते हुए चुनाव आयोग की चौखट पर पहुंच चुकी है। अखिलेश गुट ने बीते शनिवार को 205 विधायकों और 56 MLC के समर्थन का हलफनामा चुनाव आयोग को सौंपा । अखिलेश गुट ने दावा किया है कि उनके साथ 90 फीसदी डेलिगेट्स का समर्थन है। समाजवादियों के दंगल में चुनाव आयोग रेफरी की भूमिका निभाएगा।

लेकिन चुनाव आयोग के लिए ये फैसला लेना आसान नहीं होगा। हो सकता है कि सिंबल विवाद को सुलझाने में 2 महीने  का और वक्त लग जाए। ऐसे में फिलहाल सिंबल को फ्रीज़ कर दोनों गुटों को अस्थाई चुनाव चिन्ह दे दिया जाएगा। आपको बता दें कि  1979 में Congress (I) और Congress (U) के विवाद में भी ऐसा ही हुआ था और 1980 में BJP और जनता दल के विवाद में भी ऐसा ही हुआ था लेकिन इतना ज़रूर है कि चुनाव आयोग को बहुमत पर 17 जनवरी से पहले फैसला लेना ही होगा।

हालांकि कई बार ऐसे मौके भी आए जब लगा कि मुलायम और अखिलेश के बीच सुलह का रास्ता साफ हो जाएगा। लेकिन अचानक अखिलेश के अड़ियल रुख और मुलायम के अहम के बीच हुए टकराव ने सुलह के रास्ते में रोड़ा अटका दिया। घमासान इतना बढ़ा कि लखनऊ के पार्टी दफ्तर पर कुछ दिन पहले अखिलेश समर्थकों ने कब्जा जमा लिया तो दिल्ली निकलने से पहले मुलायम ने रविवार को एक बार फिर पार्टी दफ्तर में पहुंचकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया।

दफ्तर में मुलायम सिंह यादव ने अपना और शिवपाल यादव का नेमप्लेट लगवा दिया। कमरों में ताला बंद करवाकर चाभी दिल्ली लेकर आ गए, और साफ किया कि राष्ट्रीय अध्यक्ष मैं हूं। अखिलेश सिर्फ सीएम हैं। इतना ही नहीं मुलायम ने रामगोपाल को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि वो बर्खास्त नेता हैं, और उन्हे अधिवेशन बुलाने का कोई हक नहीं ।

पिता-पुत्र की इस जंग को आजम खान ने तटस्थ रहकर सुलझाना चाहा, लेकिन उन्हे सफलता नहीं मिली, उन्होने किसी एक गुट की ओर से बयान नहीं दिया । बल्कि अंत तक कहते रहे कि सबकुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अब इंतज़ार है तो बस चुनाव आयोग के रुख का। पार्टी सिंबल साइकिल पर कौन सवारी करेगा ये फैसला अब चुनाव आयोग को करना है।

साइकिल को लेकर हो रही है खींचातानी

साइकिल के दावे से पहले बाप और बेटे में टिकट बंटवारे को लेकर जंग छिड़ी हुई है, एक तरफ तो मुलायम ने उम्मीदवारी लिस्ट से सीएम अखिलेश के करीबियों का पत्ता ही साफ कर दिया तो वहीं बेटे अखिलेश ने भी मुलायम के सामने अपनी एक अलग लिस्ट ही पेश कर दी। साथ ही इस घमासान पर दूसरी पार्टियों की पैनी नजर है, वहीं ताल ठोकर दावों पर खरा उतरने वाली पार्टियों के दावों की असलियत भी चुनाव के के बाद सामने आ जाएगी।

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